स्वामी दयानंद ने अज्ञान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था जिसे आज भी जारी रखना होगा:- डा० जयेन्द्र आचार्य।

आशीष तिवारी।
गाजियाबाद:- आर्य केन्द्रीय सभा के तत्वावधान में महाशिवरात्रि पर्व एवं ऋषिबोधोत्सव का भव्य आयोजन आर्य समाज मंदिर आर -5/50 – ए, राज नगर में राजेन्द्र कुमार सिंह की अध्यक्षता में धूमधाम से सम्पन्न हुआ। आर्य जगत की सुप्रसिद्ध भजनोपदेशिकाओं संगीता आर्या एवं पुष्प चुघ नें आधुनिक साजबाज पर भजनों द्वारा ऋषि का गुणगान किया जिसे सुनकर श्रोता झूम उठे। समारोह के मुख्य वक्ता डा० जयेन्द्र आचार्य ने कहा कि हमने इतिहास में विभिन्न युद्ध पढ़े हैं लेकिन स्वामी दयानंद ने पहली बार अज्ञान के खिलाफ अंतहीन युद्ध शुरू किया था, उन्होंने कहा इंसान का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान है, अविद्या है, इसलिए अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए। स्वामी दयानंद चाहते थे दुनिया में वेद का पठन-पाठन हो, शास्त्र के बिना तर्क खोखला होता है, सत्य की कोई मेरिट नहीं होती इसलिए ताप से सूर्य बनना है तभी अंधेरा मिटेगा।उस कुशल वैघ ने भारत की बीमारी को पहचाना और उसका इलाज किया शास्त्र, तर्क, विज्ञान और फिर सत्य को खोजा। महर्षि दयानंद इस धरती पर सत्य का प्रचार चाहते थे और इसके लिए उन्होंने गुरु मंत्र दिया है सत्य के ग्रहण और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। विशेष आमंत्रित वैदिक विद्वान धर्मपाल शास्त्री ने मेरठ में कहा कि स्वामी दयानंद के जीवन पर चर्चा करना सामान्य कार्य नहीं है 22 वर्ष की आयु में घर छोड़कर सच्चे शिव की तलाश में निकलकर मथुरा स्थित गुरु विरजानंद की कुटिया में पहुंचे, दरवाजा खटखटाया अंदर से आवाज आई कौन? दयानंद बोले यही जानने के लिए आया हूं? कि मैं कौन हूं? उस दिन गुरु विरजानंद की कुटिया का द्वार नहीं खुला था अपितु भारत की किस्मत का दरवाजा खुला था, उन्होंने गुरु से 3 वर्ष की अवधि में जो सत्य ज्ञान प्राप्त किया और 20 वर्ष तक सत्य का प्रचार करते हुए कहा कि शमा की भांति जल रहा हूं, बुझ तो जाऊंगा लेकिन रोशनी कर जाऊंगा। पैराडाइज क्लब की महिला कार्यकारिणी ने सिलाई कढ़ाई सीख चुकी महिलाओं को विभिन्न उपहार दिए एवं आर्य समाज राजनगर को भी स्तुत्य कार्यों हेतु उपहार स्वरूप धनराशि भेंट की स्वागताध्यक्ष श्रद्धानन्द शर्मा ने कहा कि शिवरात्रि का यह पर्व हमें यही जागरूक करने के लिए आता है कि हम इस संसार के यथार्थ स्वरूप को जान सकें। सृजन काल उस परमात्मा का एक दिन है। प्रलय काल उसकी एक रात्रि।परन्तु परमात्मा शयन एक पल भी नहीं करता वह जाग्रत अवस्था में अपने आनंद में हमेशा मगन बना रहता है। उस परमात्मा जिसका मुख्य नाम ओ३म् है उसको ही हम सब शिव शंकरमय रुद्र महादेव त्रयम्बक आदि नामों से पुकारते हैं। क्योंकि वही हमें अपने आप का मोक्ष आनंद भी दिलाने वाला है। मुख्य अतिथि ओम प्रकाश आर्य (समाज सेवी एवं उद्योगपति) ने कहा कि हमने जीवन में एक बात सीखी है जो अच्छी बात सुनते हैं उसे अपनाएं, करनी कथनी में अंतर ना रखें, परमात्मा में विश्वास रखें, महर्षि दयानंद के कार्यों को याद रखें, उस पर चलने का प्रयास करें। समारोह के अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार सिंह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि वेद परमपिता परमात्मा की शिवमयी अर्थात् कल्याणी वाणी है जो परमात्मा ने हम सबके अतिशय कल्याण के लिए दी है जिससे हम स्वयं को, प्रकृति को और उस परम शिव को जान सकें। डा० आर के आर्य निदेशक स्वदेशी आयुर्वेद हरिद्वार ने कहा कि ऋषि दयानन्द ने राष्ट्र एवं समाज की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति प्रदान कर दी और उनके द्वारा लिखित ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश की प्रेरणा से कितने ही क्रांतिकारियों ने राष्ट्र की आजादी प्राप्त करने के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। इस अवसर पर सर्वश्री डा० वीरेन्द्र नाथ सरदाना (स्वागत मंत्री) प्रवीण आर्य, पार्षद राजेंद्र त्यागी, प्रमोद चौधरी आदि ने भी अपने विचार रखे। मंच का कुशल एवं सफल संचालन यशस्वी महामंत्री नरेन्द्र पाञ्चाल ने किया। इस अवसर पर मुख्य रूप से सर्वश्री वीके धामा, सत्य पाल आर्य, गौरव सिंह आर्य, प्रवीण चन्द गुप्ता, शशिबल गुप्ता, कौशल गुप्ता, बाल मुकंद आर्य, प्रेम शर्मा, बिशन स्वरूप, कन्हैया लाल, सुधीर धमीजा, प्रेमपाल सिंह एवं आभा चौहान नौयडा आदि लोग उपस्थित रहे।
