मुख्यमंत्री आवास और कार्यालय से कुछ दूर सड़क निर्माण में लापरवाही, नगर निगम कटघरे में

60 मीटर सड़क पर लाखों खर्च, निर्माण के बाद ही उठे सवाल—क्या जनता की गाढ़ी कमाई की हो रही बर्बादी?
आखिर एक ही कंपनी को बार-बार क्यों मिल रहा टेंडर?
जीत नारायण
लखनऊ। राजधानी के सबसे वीआईपी इलाकों में शुमार हजरतगंज क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला नरही भालू वाली गली में नगर निगम द्वारा कराई गई सीसी सड़क निर्माण की गुणवत्ता ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। 11 और 12 सितंबर की मध्य रात्रि में बनाई गई बताई जा रही सीसी सड़क एक महीने के भीतर ही बीच से चिटक गई। सड़क की हालत देखकर निर्माण कार्य की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
जब मुख्यमंत्री आवास, मुख्यमंत्री कार्यालय और विधानसभा के लगभग एक से दो किलोमीटर दूर ही निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगें, तो प्रदेश के बाकी हिस्सों की व्यवस्था को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि योगी सरकार की छवि को धूमिल करने में नगर निगम के कुछ अधिकारी और कर्मचारी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। आरोप है कि सड़क निर्माण में निर्धारित तकनीकी मानकों की अनदेखी की गई और मौके पर जिम्मेदार तकनीकी अधिकारियों की निगरानी भी नजर नहीं आई।
मानकों की अनदेखी का आरोप, 12 दिन में ही सड़क चिटकी
स्थानीय लोगों के मुताबिक सड़क निर्माण में निर्धारित जीएसबी/डीएलसी बेस लेयर, कंक्रीट ग्रेड, कैम्बर (ढलान), कंट्रोल जॉइंट्स और पर्याप्त तराई जैसे जरूरी तकनीकी मानकों का पालन नहीं किया गया। लोगों का दावा है कि निर्माण कार्य महज कुछ घंटों में पूरा कर दिया गया।
अब सड़क के बीच से चटकने के बाद सवाल उठ रहा है कि जिस सड़क को लंबे समय तक चलना चाहिए था, वह इतनी जल्दी खराब कैसे हो गई?
60 मीटर सड़क पर लाखों खर्च, निर्माण के बाद ही उठे सवाल—क्या जनता की गाढ़ी कमाई की हो रही बर्बादी?
वीडियो/फोटो में भी सड़क की सतह पर आई दरार और दूसरी तस्वीर में मेटेरियल में कमी देखना को मिली वहीं निर्माण की स्थिति को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शुरुआती दौर में ही सड़क की स्थिति खराब होने लगी है तो आने वाले समय में जलभराव और बारिश के बाद इसका क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
मजदूरों के भरोसे छोड़ दिया निर्माण?
निर्माण के दौरान नगर निगम के अवर अभियंता (JE), तकनीकी कर्मचारी अथवा पंजीकृत ठेकेदार की मौके पर मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
लोगों का आरोप है कि तकनीकी निगरानी के अभाव में मजदूरों के भरोसे ही निर्माण कार्य कराया गया। यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो सवाल सिर्फ सड़क की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि जनता के पैसे से कराए जा रहे निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग और जवाबदेही का भी है।
पहले भी इसी सड़क के निर्माण पर उठ चुके हैं सवाल
यह पहली बार नहीं है जब नरही की इसी सड़क के निर्माण को लेकर सवाल उठे हों। स्थानीय लोगों के अनुसार, इससे पूर्व इसी सड़क का निर्माण कार्य किसी अन्य कंपनी को दिया गया था। आरोप है कि उस समय भी सड़क का निर्माण निर्धारित मानकों के विपरीत कराया गया था और निर्माण के अगले ही दिन सड़क उखड़ने लगी थी।
इस मामले को लेकर खबर प्रकाशित होने के बाद नगर निगम अधिकारियों ने मामले का संज्ञान लिया था। आरोप है कि इसके बाद संबंधित कंपनी का काम रोककर दूसरी कंपनी को इसी सड़क का निर्माण कार्य सौंपा गया।
अब सवाल यह है कि जिस निर्माण कार्य को लेकर पहले ही गुणवत्ता संबंधी शिकायत सामने आ चुकी थी, उसमें दोबारा भी वही स्थिति क्यों दिखाई दे रही है?
कंपनी बदली, सवाल वही क्यों?
स्थानीय लोगों के अनुसार, पूर्व में भी नरही क्षेत्र में कई निर्माण कार्यों का टेंडर रवीन्द्र मिश्रा की कंपनी को दिया गया था। आरोप है कि कंपनी द्वारा कराए गए नाली और अन्य निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर पहले भी नगर निगम अधिकारियों से शिकायत की गई थी।
इसके बावजूद आरोप है कि शिकायतों की गंभीरता से जांच कराने के बजाय क्षेत्र में अन्य निर्माण कार्यों के टेंडर भी उसी कंपनी को दिए गए। ऐसे में टेंडर प्रक्रिया, ठेकेदारों के चयन और गुणवत्ता जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठना लाजिमी है।
अधिकारी सवालों से क्यों बच रहे हैं?
मामले की जानकारी के लिए पत्रकार द्वारा नगर निगम लखनऊ के उच्च अधिकारियों से बातचीत की गई। आरोप है कि अधिकारियों ने निर्माण कार्य की जिम्मेदार कंपनी, टेंडर की राशि और दिए गए कार्यों की संख्या तक स्पष्ट नहीं की। वहीं सूत्र ने जानकारी देते हुए बताया कि CC सड़क निर्माण कार्य की पूरी विडियो उसके पास सुरक्षित है।
आखिर नगर निगम को यह जानकारी सार्वजनिक करने में हिचक क्यों है?
क्या संबंधित अधिकारियों के पास निर्माण कार्य का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है या फिर जिम्मेदारी तय होने का डर है?
अब जांच की बारी
स्थानीय निवासियों ने नगर आयुक्त से मामले का तत्काल संज्ञान लेते हुए सड़क की कोर-कटिंग सहित तकनीकी गुणवत्ता जांच कराने की मांग की है। साथ ही यह भी मांग की गई है कि पूर्व में इसी सड़क के निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड, टेंडर प्रक्रिया, भुगतान और गुणवत्ता जांच की रिपोर्ट को भी सार्वजनिक किया जाए।
जांच में यदि निर्माण मानकों की अनदेखी या लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार और कार्यदायी संस्था की जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की मांग की गई है।
सवाल सीधा है—
जब पहले इसी सड़क के निर्माण पर सवाल उठे, काम रोका गया और कंपनी बदली गई, तो फिर नई कंपनी के निर्माण में भी गुणवत्ता को लेकर सवाल क्यों खड़े हो गए?
क्या नगर निगम सिर्फ कंपनी बदल रहा है या निर्माण की निगरानी और गुणवत्ता व्यवस्था भी बदलेगी?
जनता के पैसे से बनी सड़क अगर एक महीने में ही चिटकने लगे तो इसकी जवाबदेही आखिर किसकी है?
